Saturday, September 26, 2015
Sunday, December 28, 2014
Tuesday, October 14, 2014
मीणा लोक साहित्य --1
----- ( होली गीत)------
ये फागुन के महिने में रात्रि के समय कुंवारी लड़कियों द्वारा गाया जाने वाला लोकनृत्य गीत (धोड़या गीत) है । इसमें गीतों के साथ साथ नृत्य भी होता हैं। इसमें लड़कियां 10-15 की टोली बनाकर दो समूहों में विभक्त हो जाती हैं। एक समूह की लड़कियां गाती हुई दूसरे समूह की तरफ़ तेजी से दौड़ती हुई जाती है तथा यही पुनरावृति दूसरे समूह द्वारा दोहराई जाती है।इन गीतों का प्रतिपाद्य हंसी मजाक तथा साधारण से परिवर्तन के साथ दैनिक जीवन की घटनाओं पर आधारित होता है । इन गीतों को रात्रि के समय गाया जाता है । यहाँ कुछ स्फुट उद्धरण प्रस्तुत हैं -
होड़ी मंगड़े जब बूंद पड़े
सम्मत को घाटो नहीं मैया । होड़ी -----
आदिवासी समाज प्रकृति आधारित है अत: उसमें शकुन भी प्राकृतिक घटनाओं को ध्यान में रखकर समझे जाते हैं । मीणा अंचल में यह मान्यता है कि होली दहन के समय यदि बूंद पडती है तो उस वर्ष वर्षा का अभाव नही रहता ।
भाई रे मीणा गांगड़दी,
तैने बिन्या लगन होड़ी मंगड़ादी । भाई रे------
इस गीत में मनुवादी विचारधारा का तिरस्कार प्रतिफलित हुआ है । आदिवासियो के अपने नियम होते है उसी के आधार पर वे त्यौहार आदि को मनाते हैं।
नौ बीघा आरेड़,
बकरिया खा गई बूचा कानन की । नौ ---------
मीणा अंचल में पहले अरहड की खेती बहुत होती थी, अब इसमें कमी आई है । उसकी रखवाली की तरफ इस गीत में इशारा किया गया है ।
नौ मण जीरो नौ सै को,
मेरा जेठ बिन्या कुण बेचेगो । नौ -----------
जीरा भी पहले यहां की एक मुख्य फसल के रुप में किया जाता था जो सबसे मंहगा बिकता था । इस गीत में बताया गया है कि मंहगी वस्तु का बेचान जिम्मेदार व्यक्ति ही कर सकता है जो हिसाब किताब की समझ रखता हो । यहां घर मे जेठ को जिम्मेवार और घर का बडा होने के कारण यह अधिकार सिद्ध होता है ।
भाई रे छोरा पाखण्डी,
बाड़ा में खाय कुलामंडी । भाई --------
यह वाचाल किस्म के व्यक्ति की चारित्रिक गतिविधियो का अंकन ही इस गीत का प्रतिपाद्य रहा है ।
होड़ी आई होड़ी आई ढ़प ल्यादे
ई तो होगो पुराणों मैया और ल्यादे।
ग्राम्य अंचल में होली के उल्लास में ढप और चंग के साथ गायन की परिपाटी रही है ।
चणां कटै लम्बी पाटी में
भरल्या रै मोटर गाड़ी में ।
मीणा अंचल में पहले चने की फसल फरपूर मात्रा में होती थी । साथ ही इस गीत में कृषि मे आए मशीनीकरण के प्रयोग का भी पता चलता है ।
भाई रे छोरी मैणा की,
भरल्याई रे थाडी गहणा की ।
आभूषणों का शौक आदिवासी स्त्रियों में ज्यादा रहा है । चांदी और सोने के विभिन्न आभूषण शादी में भी दिये जाते हैं । अच्छी फसल होने पर आभूषण बनवाने के अनेक उदाहरण मीणा लोक गीतों मे मिलते है ।
बणियों करै हिसाब,
बरेणी दारी कूदी कूदी डोले गिराडा में।
बैसाख में फसल के पैदा होने पर किसान बनिये का हिसाब करता है साथ ही कुछ छूट करने की भी विनति करता है, परन्तु बनिया की स्त्री अपने कंजूस स्वभाव के चलते यह छूट प्रदान करने नहीं दे रही । इसी प्रवृत्ति को इस गीत में दर्शाया गया है ।
नया बैल की जौतन सू
मेरो गोज्यो भरगो लोटनसू ।
आदिवासी सदैव से कठोर परिश्रम से कृषि कार्य करता रहा है । खेत को जोतने के लिए 1980 से पहले हल-बैल ही प्रमुख साधन थे । नया बैल अधिक जुताई करता है जिससे ज्यादा जमीन जोती जा सके । इसके फलस्वरुप फसल में भी बढोतरी होती थी । इसी मनोदशा का वर्णन इस गीत की विषय वस्तु है ।
( साभार -- विजय सिंह मीणा जी की पुस्तक मीणा लोक साहित्य एवम संस्कृति से )
{एक टेंट में सेर में चणा सम्वत को धोखो नहीं मय्या..
रंडवो करे मजाक बरेणी दारी कूदी कूदी डोले गिराडा में...
होडी आइ होडी आई गुड ल्यादे, कंजी कू थोडी खड ल्यादे....
पलक्या पै पग जब दीज्यो, खंगवाडी मोय घडा दीज्यो....
दो भैसन का धीणा सू, मत भिडज्यो मोटा मीणा सू...
टोडा सु गूंजी ल्यावेगो, म्हारो बलम आज नही आवेगो ...
को जाऊ मैया कलवा कै, म्हारो जातेई हलवा कर देगो ...
को जाऊ मैया भैसन पै, म्हारी टुंडी देख पडो रडके...
सुण रै छोरा सासू का, घडवा दै .. घडवा दै कुडंल कानन का..
पीलू को मचौल्यों मेरी जीजी क् सू ल्याई ...होलै होलै रै बलम न तोराळ्यो..
ढांढयोण को पेड़ महारा बाड़ा में दिन्गा दिन्गा रै ननद का गौणा मे..
दौरानी पै तीन चुटीला , एक दुवा दै देवरिया ..
याको बाप करे चुगली, मत बैठे मोरया या टुगली...
हलवो खायो रंडवा को, मोय लोभ दे दियो खंडवा को.....
गिर्राजी की जय बोले, रंडवा की नीत किस्यां डोले....
रंडवा की छान पै बिलाई डोले , रन्द्वो जाणे लुगाई डोले..}
मीणा लोकगीतों की मूल परम्परा मौखिक है, इसीलिए शास्त्रीय दृष्टि से इनके शैल्पिक गठन का निश्चित प्रारुप नहीं बन पाया है । इसके बावजूद यह सर्वाधिक जीवंत और हरियाली विधा है, जिसमें हजारो वर्षों का हमारा सांस्कृतिक इतिहास सुरक्षित है । इन्हीं के कारण गतिशील परम्पराएं व संस्कार आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं । सनातन संर्घष और जीवट-जिजिविषा का ऐतिहासिक बीजभूमि का यह उर्वर दर्शन अपने आप में लोक जीवन का इतिहास है । इन लोकगीतों की भाषा, भाषा-शास्त्रियों के लिए अथाह सागर है जिसे बार-बार मंथन प्रक्रिया से गुजरना है । इन गीतों का एक-एक शब्द अपने आप में बहुत गहरे और गूढ अर्थ समेटे हुए है । नवीन शब्द-गठन, नये प्रतीक और सीधे सहज सरल भावों का यह भव्यतम कुबेर कोष है ।
Monday, October 13, 2014
मीणा लोक साहित्य --2
----कार्तिक स्नान गीत-----
मीणा अंचल में कार्तिक के महिने में प्रात: चार-पांच बजे उठकर स्नान कर देवी-देवताओं को जलअर्पण व पूजा अर्चना को शुभ माना जाता है । इसे पुरुष व महिला, बूढ़े एवं बच्चे सभी करते हैं ।
स्त्रियां एवं नवयुवतिया प्रात: ब्रह्ममुहुर्त में उठकर गांव के कुऐ पर जाकर स्नान करती हैं तथा इस समय गंगाजी व अन्य देवताओं से संबंधित गीत गाये जाते हैं । प्रात:काल की बेला में ये गीत इतने मधुर लगते हैं कि वातावरण बड़ा ही मनमोहक हो जाता हैं । इन गीतों को स्त्रियां बड़े ही ऊंचें सुर और मधुर आवाज में गाती हैं । इन गीतों से मन को विशिष्ट प्रकार की शांति मिलती हैं तथा दिन भर तरोताजगी महसूस होती हैं ।
गंगाजी के घाट पै सासू कातक न्हावै, हो राम…..
सासू कातक न्हावै हो राम
सुसरो सुखावे धौड़ी धोवती,
सासू केस सुखावे हो राम, सासू केस सुखावे
इन गीतों में गंगास्नान महात्म्य, नाम स्मरण की महिमा,देवताओं का सुमरण आदि पर विशेष बल दिया जाता है । राम-सीता की कथा पर आधारित गीतों एवं कृष्ण के चीरहरण आदि कथाओं पर आधारित गीतों की इनमें भरमार रहती हैं । कृष्ण द्वारा गोपियों का चीर चुराने पर आधारित यह गीत -
गंगाजी के घाट पै गूजरी कूदर न्हावै ।
चीर उतार कदम पै रख् दियो न्हावे दे दे ताड़ी,
आगे कान्हा गाय चरावे लेगो चीर हमारी,
चीर तुम्हारी जब ही मिलेगी जल से हो जा न्यारी,
चांद सुरज दौनू लाजन मारया धरती बोजन मारी।
इसी क्रम में सीता जी के जन्म आदि घटनाओं पर अवलम्बित इस गीत की धारा बड़ी ही मनोहारी है
गंगाजी के घाट पै एक कन्या तो जनमी हो राम
कन्या तो जन्मी मौज की सीता नाम धरायो, हो राम
नाम धरायों मौज को वाको धनुष बणायो, हो राम
धनुष ने तोड़े सीता नै ब्हावे, उतो राम बतायो, हो राम
रावर्ण सिर का घुड़ लिया वाकी आंगड़ी तो आगी, हो राम
नाम लियो भगवान को दशरथ जाया ने तोडयो, हो राम
धनुष तो तोड़यो राम ने वाकू सीता तो ब्याही, हो राम
इस गीत में धनुष भंग का वर्णन किया गया है तथा ईश्वर के नाम को ही सर्वोपरि बताया गया है । यहाँ रावर्ण की असफलता और सीता का राम के साथ विवाह का आंचलिक बोली में वर्णन एक अद्भुत रोमांच पैदा करता है ।प्रत्येक पंक्ति के अंत में राम के नाम के स्मरण को प्रश्रय दिया गया है ।
"जेसू न्हाऊँ रे जीजा कातिक ,मिल जाय तौ सर को भरतार..""कातिक ज्यों न्हावे ज्यों कलर चढें पतली सी छोरी पे ..""कातीक नाहाबा सु होगो र गोरो डील छोरि को .."
फल कातक को लेगो. रोडू छोंकडा नीचे...कातक न्हाबा सु केशन्ती , मिलेगो ्भरतार जीजो सो...कातिक न्हावे तो गोरन्ता, आजा कुआ का ढाणा में."कातिक नाही र भारो दुःख पाई र पाती रोड्लो आग्यो ।
मुढ़ा सु भी को बोल सासु को जायो जायो ।।"
"कातिक नाहव मंदर ढोक ,डिया की शुभकामना माग ।
काई चक्कर भायेली रोजीना ई आदी प जाग ।।"
लोकसाहित्य में लोक जीवन के अवलोकन के लिए यह निहायत जरुरी है कि हम उस लोकजीवन के प्रति सहज संवेदनशील हों । इन गीतों की भाषा शिष्ट एवं साहित्यिक ना होकर जनसाधारण की भाषा है और उसकी वर्ण्य-वस्तु लोक जीवन में गृहीत चरित्रों, भावों और प्रभावों तक सीमित है । इन कविताओ की जमीनी जिंदगी का वृक्ष की साख जैसा फैलाव है और उस पर निस्तब्ध पंख समेटे बैठी हुई एक उजले पंख वाली गोलमोल चिडिया के सादृश्य दिखने वाले ये गीत अंतर्मन की मुस्कान हैं ।
(साभार - पुस्तक "मीणा लोक साहित्य एवम संस्कृति" से )
शिकार
अंग्रेजों के ज़माने की बात है.जंगलात महकमा के रेस्ट हाउस में एक अंग्रेज प्रवास कर रहा था. उसका शौक था शिकार करना और करवाना. एक आदिवासी उसका शौक पूरा करने के लिए रोजाना किसी न किसी जंगली जानवर का शिकार करके लाता था. कितने खतरनाक जानवर का शिकार वह आदिवासी करके लाया इस आधार पर अंग्रेज अफसर उस आदिवासी को ईनाम देता था. अंग्रेज अफसर शिकार किये वन्य जीवों की चीरफाड़ करने के पश्चात् उनके सिर को रेस्ट हाउस की दीवारों पर सजा दिया करता था.
एक दिन वह आदिवासी शिकार करके लाया और अंग्रेज अफसर को कहने लगा, 'हुजूर, आज मैंने सबसे खतरनाक जानवर का शिकार किया है. इसके सर को गर्दन सहित कौन सी दीवार के किस हिस्सा में टांगोगे ?'
'पहले यह तो बताओ भई कि शिकार है कहाँ? मैं देखूं तो सही.'
'शिकार यह रहा.' बोरी को खोलकर शिकार बताते हुए आदिवासी ने कहा.
अंग्रेज अफसर शिकार देखते ही चौंका. शिकार के रूप में एक मनुष्य की लाश थी.
'तूने यह क्या गज़ब किया?' अफसर ने पूछा.
'माई बाप, गज़ब मैंने नहीं किया, गज़ब तो इस जानवर ने किया है. इस दरिन्दे ने मेरी बेटी के साथ बलात्कार करने के बाद उसका गला घोंट दिया. किसी जंगली जानवर ने आज तक ऐसा नहीं किया. इस जंगल में इस जैसा खतरनाक जानवर मैंने जीवन में पहले कभी नहीं देखा.
बेटी
आज हीरोपंती देखी, बहुत लोगो ने कहा अच्छी नहीं है,
मैंने सोचा एक बार देख
मैंने सोचा एक बार देख
ली जाए क्या बुराई है,
फिल्म में हीरो -
हीरोइन की एक्टिंग का तो नहीं पता मुझे
लेकिन पूरी फिल्म मुझे विलेन
यानी की लड़की के बाप के कंधो पे टिकी लगी,
लड़की के बाप का रोल प्रकाश राज जी ने
बहुत ही बखूबी निभाया है, पहले भी ऐसे
विषयों पे फिल्म बन चुकी है,
जहा लड़की का बाप विलेन रहता है, मैंने
देखी भी होगी पर याद नहीं या उस समय
इतनी समझ नहीं थी.
लेकिन आज मैंने उस दर्द को महसूस किया,
कि जिस बाप की लड़की घर छोड़ कर भाग
जाए तो उस पर क्या बीतती होगी, फिल्म में
२० दिनों तक लड़की का बाप
अपनी लड़की को इसी आस में
तलाशता फिरता है
कि मेरी बेटी अपनी मर्जी से नहीं भागी,
उसे
वो लड़का भगा के ले गया, लेकिन जब वो उस
लॉज में जाता है जहा उसकी बेटी रुकी थी, उस
कमरे की हालत देख कर उसे समझ आ जाता है
की उसकी बेटी अपनी मर्जी से भागी थी, तब
वो टूट जाता है,
वह हीरो से कहता है कि कैसे
उसने २० साल अपनी बेटियों को अपनी जान से
भी ज्यादा प्यार किया, उन्हें
पढाया लिखाया, हर सुख दिया, और जब एक
दिन उसे उसकी वही बेटी एक बस में दिखती है
तो उस बस के पीछे भागता है पागलो की तरह
और बेटी बस से उतर कर जब ये कहती है कि आप
लोग क्यूँ कुत्तो की तरह पीछे पड़े है तो वो और
भी टूट जाता है.
बेटी और बाप का रिश्ता बहुत ही अलग
होता है, शुरू से देखा जाता है बेटी माँ से
ज्यादा अपनी पापा से अटैच होती है,
जब
स्कुल में कोई बच्चा उसे तंग करता है
तो वो कहती है कि मै अपने पापा से शिकायत
करुँगी, बाप अपनी बेटी को परछाई की तरह
रखते है, उस की हर तरह से सुरक्षा करते है,
लेकिन वही बेटी जब अपने बाप की इज्जत
नहीं करती, उसके प्यार को भूल जाती है
तो उस बाप को बहुत दुःख होता है,
मै ये भी नहीं कह रही की प्यार करना गलत
है, लेकिन आप किसी के साथ भाग कर
शादी करो इसके पहले अपने माँ बाप के बारे में
जरुर सोचो, आप उन्हें बता सकते है,
वो कभी भी आपका बुरा नहीं चाहेंगे, उन्होंने
हमसे ज्यादा दुनिया देखी है,
उन्हें पता है
की हमारा अच्छा क्या है और बुरा क्या है..
Tuesday, May 27, 2014
मीणा बनाम मीना
न्यायपालिका की कार्य प्रणाली और तत्सम्बन्धी निर्णयों का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का प्राथमिक और नैतिक दायित्व है। अपवादों को छोड़करन्यायपालिका के निर्णय गलत और अवैज्ञानिक नहीं होते हैं । अधिकांशतः निर्णय सटीक होते हैं । किन्तु, कुछेक निर्णय ऐसे भी होते हैं जिनमें असली तस्वीर सामने नहीं आ पाती, कुछेक निर्णय ऐसे होते हैं जिनमें कष्ट और पीड़ा के अनेक दृश्य सामने आते हैं, मनुष्य के अन्दर की मनुष्यता तार-तार होने लगती है। आरक्षण अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है। इससे जुडे मामले में अक्सर देखा गया है कि उच्च पीठ के निर्णयों को (एस पुष्पा बनाम मेरी चन्द्राशेखर) एकल पीठ बदल देती है और सरकार व सरकार की एजेंसियाँ हाथ-पर-हाथ रखकर तमाशबीन बनी रहती है, शायद उनको ऐसा होने या करने में आत्मिक सुख का अनुभव होता है जो मनुवादी और संकीर्ण ब्राह्मणवादी सोच का परिचायक होता है। देश में ऐसी कई संकीर्ण सोचवाली एजेंसियाँ और व्यक्ति मौजूद है जो सामाजिक समरसता, जातीय सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और अखंडता उन्हें कतई पसंद नहीं है, वे येन-केन-प्रकार्णेन इसे तार-तार करना चाहते हैं , ऐसी ताकतों के कुटीलतापूर्ण खेल को नियन्त्रित करने की महत्ती जरूरत है।
निर्णय-प्रक्रिया न्यायपालिका के समक्ष रखे गये साक्ष्य, दस्तावेज़ों और चश्मदीद गवाह के बयानों के आधार पर ही लिये जाते हैं । किन्तु, यदि न्यायपालिका के समक्ष रखे गये सबूतों, कागजात उचित ढ़ंग से प्रस्तुत नहीं हो तो निर्णय-प्रक्रिया में खामिया आ सकती हैं, इसमें तनिक भी संदेह की गुंजाइश नहीं है। मीणा बनाम मीना के मामले में माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय पर भी तकनीकी सवाल उठाना जायज नहीं है। किन्तु, सरकार, सरकार के नुमांइदों और मामले को न्यायपालिका के समक्ष प्रस्तुत करने वाली मानसिकता पर सवाल उठने अत्यंत लाजिमी है क्योंकि बिना सोचे-समझे लिये गये फ़ैसलो से हमारे दीर्घकालिक हितों को नुकसान हो सकता है। यह प्रवृति राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है, विशेषकर आरक्षण सम्बन्धी मामलों के कानूनी निर्णयन- प्रक्रिया में ।
न्यायालय में विचाराधीन याचिका में मीणा जाति को अनुसूचित जन जाति से बाहर करने की माँग की है। यह भी कहा गया है कि राजस्थान अनुसूचित जन जाति की सूची में क्रम सख्या 9 पर ‘मीना’ का उल्लेख है। जब मीणा शामिल ही नहीं है तो बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू करने की माँग का औचित्य नहीं है। ‘मीणा बनाम मीना’ के अन्तःसम्बन्ध को ऐतिहासिक भाषाविज्ञान और अर्थविज्ञान के मानदण्डों पर विवेचित करना अधिक समीचीन होगा । मानक हिन्दी की संरचना की दृष्टि से ‘म’, ‘ण’, ‘न’ की तुलना में ‘ङ’ तथा ‘ञ’ का महत्व नगण्य है। इन दोनों व्यंजनों का प्रयोग केवल स्थान की दृष्टि से अपनी वर्गीय ध्वनियों के पूर्व में ही होता है अर्थात ‘ङ’ का प्रयोग ‘क’ वर्ग और ‘ञ’ का प्रयोग ‘च’ वर्ग से पूर्व होता है अन्यत्र नहीं । आवृति की दृष्टि से ‘न’ का प्रयोग अधिक होने के कारण ‘ङ’ और ‘ञ’ को ‘न’ का संस्वन माना जाता है । मानक हिन्दी में उसकी प्रकृति और प्रकार्य के अनुसार ‘न’ और ‘म’ नासिक्य ध्वनियॉ ही महत्वपूर्ण हैं । शब्दों के आदि,मध्य और अन्त में इनका स्वतंत्र प्रयोग होता है और अर्थ-भेदकता के कारण ये सभी स्वनिम है।
कालानुक्रमिक विकास की दृष्टि से संस्कृत के शब्दों में प्रयुक्त ‘ण’ ध्वनि हिन्दी तक आते-आते ‘न’ में तब्दील हो गयी। किन्तु, तत्सम शब्दों की दृष्टि से‘ण’ भी सार्थक नासिक्य है और केवल तत्सम शब्दों में प्रयोग की दृष्टि से स्वनिम माना जा सकता है, जो एतिहासिकता और प्राचीनता का द्योतक है। ‘ण’ और‘न’ ध्वनियों के ध्वनिगत और स्वनिमगत अन्तर और विभेद को समझने से पहले हमें एस एन त्रुवेत्स्काय और रोमन याकोब्सन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को समझना पडेगा। एक ही श्वासाघात में उच्चरित ध्वनि या ध्वनि समूह को अक्षर कहा जाता है, इसकी संरचना में एक स्वर होना अनिवार्य है, व्यंजन एक से अधिक हो सकते हैं । इसी तरह भाषाविज्ञान के सूक्ष्म सिद्धान्तों और अन्वेषणों को ध्यान में रखते हुए ‘ण’ और ‘न’ का भाषावैज्ञानिक विश्लेषण भी तार्किक और अपरिहार्य है, तभी किसी तटस्थ परिणाम पर पहुँचा जा सकता है। रोमन याकोब्सन द्वारा प्रतिपादित अर्थभेदक-अभिलक्षणों का पुंज स्वनिम कहलाता है, यह काल्पनिक ध्वनि इकाई होती है जिसकी सत्ता भौतिक न होकर काल्पनिक होती है, जिससे अर्थ-तत्व सृजित होते हैं ।
स्वनिम एकाधिक संस्वन का प्रतिनिधित्व करता है, जो ध्वन्यात्मक दृष्टि से मिलते-जुलते, अर्थभेदकता में असमर्थ तथा आपस में मुक्त या परिपूरक वितरण में प्रयुक्त होते हैं । वहीं, एक ही स्वनिम के विभिन्न रूप जो विशेष भाषिक परिस्थितियों में स्वनिम् का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें ध्वन्यात्मक समानता पायी जाती है, जो व्यतिरेकी वितरण में न प्रयुक्त होकर परिपूरक वितरण; आदि, मध्य और अन्त में प्रयुक्त होते हैं, संस्वन कहलाते हैं । इसका निर्धारण स्वनिमों के वितरण के आधार पर किया जाता है, जिसमें विरोधी, अविरोधी वितरण, परिपूरक वितरण एवं मुक्त वितरण की भाषावैज्ञानिक प्रक्रिया का विशेष योगदान है । इसी आधार पर ध्वनियों के अर्थ-निर्धारण की वैज्ञानिक प्रक्रिया सम्पन्न होती है, जिसे रोमन याकोब्सन ने द्विचर विरोध या परिच्छेदक-अभिलक्षण के सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित किया । यह भाषाविज्ञान विशेष रूप से अर्थ-निर्धारण के क्षेत्र में सबसे बडी देन है। इस प्रक्रिया को विश्व के अधिकांश देशों में विधिक कार्यवाहियों की निर्णयन-प्रक्रिया में सटीक आधार बनाया जाता है।
लब्ध-प्रतिष्ठ विदेशी भाषातत्वज्ञ एल पी टेस्सिटरी, जान बीम्स, रेवरेड जी मैकेलिस्टर, सर जार्ज ग्रियर्सन और सुकुमार सेन, सुनीति कुमार चटर्जी, एम एस माहन्डगे, नाम वर सिह, कैलाश चन्द्र अग्रवाल एवं प्रोफ़ेसर राम लखन मीना इत्यादि भारतीय भाषाविज्ञानी आदि ने अपने अन्वेषणशील शोध-कार्यो के माध्यम से प्रतिपादित किया कि हिन्दी और राजस्थानी भाषाओं में कमोवेश समान रूप से सभी ध्वनियाँ प्रयुक्त होती है। किन्तु, उभय भाषाओं में ‘ण’ और ‘न’ ध्वनियों के बीच व्यतिरेक मिलता है, हिन्दी में ये दोनों व्यतिरेकी हैं वहीं राजस्थानी में ये ध्वनियॉ परिपूरक वितरण में प्रयुक्त होती हैं । उच्चारण-स्थान और उच्चारण-विधि कीदृष्टि से ‘ण’ मूर्धन्य, नासिक्य, सघोष,अल्पप्राण, ‘न’ वर्त्स्य, नासिक्य, सघोष,अल्पप्राण के रूप में अधिक समीप है । इसमें इन ध्वनियों से युक्त शब्द बहुलता से मिलते हैं जो कि राजस्थानी की मौलिक विशिष्टता है । ‘ण’ ध्वनि हिन्दी में केवल तत्सम शब्दों में ही मिलती है, अन्यत्र इसका प्रयोग नगण्य है जबकि राजस्थानी में ‘ण’ का प्रयोग बहुलता से होता है और ‘णकारान्त’ राजस्थानी की प्रमुख एवं स्वाभाविक विशेषताओं में से एक है । यह प्रवृति राजस्थानी में अपभ्रंश काल से ही आरम्भ हो चुकी थी जो राजस्थानी भाषा के हिन्दी से भी अधिक प्राचीन और समृद्ध होने का प्रमाण है । यही कारण है कि राजस्थानी में जीवन का उच्चारण जीवण, रानी का उच्चारण राणी, मीना का उच्चारण मीणा जैसे अनगिनत अनेकानेक उद्वरहण भरे पडे हैं। व्युत्पत्ति विज्ञान के सिद्धान्त अनुसार ‘मीणा’ शब्द मयण,मयणा,मैयणा,मैणा,मीणा तथा हिन्दी भाषा के मानकीकरण की प्रक्रिया में ‘मीना’ मानक शब्द के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है, दोनों शब्द एक ही अर्थ के द्योतक है । इतिहासकार कर्नल जेम्स टाड, गौरी शंकर हीरा नंद ओझा, अन्य विभिन्न इतिहासकारों तथा नृविज्ञानवेत्ताओं का मानना है कि जहाँ राजस्थान के विभिन्न भागों में इसे मीणा, मेणा, मैणा आदि नामों से पुकारा जाता है, वहीं राजस्थान के बाहर यह समुदाय ‘मीना’ जाति के रूप में जानी जाती है । राजस्थान के बाहर निवास करने वाले ‘मीना समुदाय’ को आरक्षण के लाभ से वंचित भी किया गया है जबकि वह अपने उपनाम के रूप में ‘मीना’ शब्द का ही प्रयोग करते हैं । पुरातत्वविद् फ़ादर हेरास भी सटीक विश्वास रखते थे कि राजस्थान में निवासित आधुनिक ‘मीणा’ पूर्व आर्य काल के ‘मीन’ गण चिह्न वाले लोगों के वंशज है जो कबीलों के रूप में जंगलों में रहने हैं । मीन पुराण के रचयिता एवं राजस्थानी और भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ श्री मुनि मगनसागर की प्रतिस्थापना है कि ‘मीना’ जाति राजस्थान में ‘मीणा’ कहकर पुकारी जाती है, अतः राजस्थान के सन्दर्भ में ‘मीना’ और ‘मीणा’ एक ही जाति समुदाय के उच्चारणगत भेद हैं ।
भाषाविज्ञानी और अनुवादवेत्ता के रूप में मेरा मानना है कि वस्तुत: मीणा बनाम मीना की समस्या हिन्दी और राजस्थानी की समस्या नहीं है क्योंकि राजस्थानी के सन्दर्भ में ‘ण’ और ‘न’ के बीच स्वनिम और संस्वन का सम्बन्ध है, अर्थगत नहीं । दरअसल समस्या की जड़ अनुवाद से जुड़ी है जिसमें (mina) का अनुवाद केवल “मीना” कर लिया गया है। राजस्थान के सन्दर्भ में इसका अनुवाद “मीना और मीणा” दोनों होना चाहिये या दोनों का अर्थ-संज्ञान एक ही रूप में लेना चाहिये। मीना की अपेक्षा मीणा शब्द राजस्थानी भाषा और आदिवासी संस्कृति के अधिक निकट है, मौलिक है, स्थानीय है जिसकी व्युत्पति गूगल सर्च पर उपलब्ध सामग्री एवं विश्व की भाषाओं की एट्लस एथनोलोग के विश्लेष्ण में शामिल किया गया है जिसको अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक लिपि में लिप्यान्तरित किया गया है । किन्तु, याचिका कर्ता की संकीर्ण सोच और शान्तिप्रिय राजस्थानी माहौल में वैमनस्य फ़ैलाने के कलुषित उद्देश्य दायर की गयी याचिका में थोडे से सन्दर्भगत एवं अनुवादगत भेद के कारण न्यायपालिका ने एक नये विवाद को पनपाने की ओर अग्रसर है जिसके पीछे क्या सोच रही होगी, यह कहना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अर्थदीप्तियों और अर्थ-निष्पतियों के आधार पर निर्णय देने वाली न्यायपालिका स्थूल और यादृच्छिक अर्थ-निर्णय की ओर क्यों अग्रसर है और जिसका हल बेहद पेचीदा किस्म का है ।
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