मीणा लोक साहित्य --2
----कार्तिक स्नान गीत-----
मीणा अंचल में कार्तिक के महिने में प्रात: चार-पांच बजे उठकर स्नान कर देवी-देवताओं को जलअर्पण व पूजा अर्चना को शुभ माना जाता है । इसे पुरुष व महिला, बूढ़े एवं बच्चे सभी करते हैं ।
स्त्रियां एवं नवयुवतिया प्रात: ब्रह्ममुहुर्त में उठकर गांव के कुऐ पर जाकर स्नान करती हैं तथा इस समय गंगाजी व अन्य देवताओं से संबंधित गीत गाये जाते हैं । प्रात:काल की बेला में ये गीत इतने मधुर लगते हैं कि वातावरण बड़ा ही मनमोहक हो जाता हैं । इन गीतों को स्त्रियां बड़े ही ऊंचें सुर और मधुर आवाज में गाती हैं । इन गीतों से मन को विशिष्ट प्रकार की शांति मिलती हैं तथा दिन भर तरोताजगी महसूस होती हैं ।
गंगाजी के घाट पै सासू कातक न्हावै, हो राम…..
सासू कातक न्हावै हो राम
सुसरो सुखावे धौड़ी धोवती,
सासू केस सुखावे हो राम, सासू केस सुखावे
इन गीतों में गंगास्नान महात्म्य, नाम स्मरण की महिमा,देवताओं का सुमरण आदि पर विशेष बल दिया जाता है । राम-सीता की कथा पर आधारित गीतों एवं कृष्ण के चीरहरण आदि कथाओं पर आधारित गीतों की इनमें भरमार रहती हैं । कृष्ण द्वारा गोपियों का चीर चुराने पर आधारित यह गीत -
गंगाजी के घाट पै गूजरी कूदर न्हावै ।
चीर उतार कदम पै रख् दियो न्हावे दे दे ताड़ी,
आगे कान्हा गाय चरावे लेगो चीर हमारी,
चीर तुम्हारी जब ही मिलेगी जल से हो जा न्यारी,
चांद सुरज दौनू लाजन मारया धरती बोजन मारी।
इसी क्रम में सीता जी के जन्म आदि घटनाओं पर अवलम्बित इस गीत की धारा बड़ी ही मनोहारी है
गंगाजी के घाट पै एक कन्या तो जनमी हो राम
कन्या तो जन्मी मौज की सीता नाम धरायो, हो राम
नाम धरायों मौज को वाको धनुष बणायो, हो राम
धनुष ने तोड़े सीता नै ब्हावे, उतो राम बतायो, हो राम
रावर्ण सिर का घुड़ लिया वाकी आंगड़ी तो आगी, हो राम
नाम लियो भगवान को दशरथ जाया ने तोडयो, हो राम
धनुष तो तोड़यो राम ने वाकू सीता तो ब्याही, हो राम
इस गीत में धनुष भंग का वर्णन किया गया है तथा ईश्वर के नाम को ही सर्वोपरि बताया गया है । यहाँ रावर्ण की असफलता और सीता का राम के साथ विवाह का आंचलिक बोली में वर्णन एक अद्भुत रोमांच पैदा करता है ।प्रत्येक पंक्ति के अंत में राम के नाम के स्मरण को प्रश्रय दिया गया है ।
"जेसू न्हाऊँ रे जीजा कातिक ,मिल जाय तौ सर को भरतार..""कातिक ज्यों न्हावे ज्यों कलर चढें पतली सी छोरी पे ..""कातीक नाहाबा सु होगो र गोरो डील छोरि को .."
फल कातक को लेगो. रोडू छोंकडा नीचे...कातक न्हाबा सु केशन्ती , मिलेगो ्भरतार जीजो सो...कातिक न्हावे तो गोरन्ता, आजा कुआ का ढाणा में."कातिक नाही र भारो दुःख पाई र पाती रोड्लो आग्यो ।
मुढ़ा सु भी को बोल सासु को जायो जायो ।।"
"कातिक नाहव मंदर ढोक ,डिया की शुभकामना माग ।
काई चक्कर भायेली रोजीना ई आदी प जाग ।।"
लोकसाहित्य में लोक जीवन के अवलोकन के लिए यह निहायत जरुरी है कि हम उस लोकजीवन के प्रति सहज संवेदनशील हों । इन गीतों की भाषा शिष्ट एवं साहित्यिक ना होकर जनसाधारण की भाषा है और उसकी वर्ण्य-वस्तु लोक जीवन में गृहीत चरित्रों, भावों और प्रभावों तक सीमित है । इन कविताओ की जमीनी जिंदगी का वृक्ष की साख जैसा फैलाव है और उस पर निस्तब्ध पंख समेटे बैठी हुई एक उजले पंख वाली गोलमोल चिडिया के सादृश्य दिखने वाले ये गीत अंतर्मन की मुस्कान हैं ।
(साभार - पुस्तक "मीणा लोक साहित्य एवम संस्कृति" से )

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