Thursday, March 13, 2014

पद

धवले अपनी मिठास भरी आवाज में हमारे मन के तारों में अनुगूंजें पैदा करते हुए गाते हैं-

कछु लाकड़ी चीकणी, कछु भोंटी करवाड़ी 
चंदा को इ नहींअ बजीअ दोनूं हाथन से ताड़ी।

विवाद की षुरूआत होती है यहाँ से। स्त्री-पुरूष सम्बन्ध में आए इस पेच से। इस तरह के पेचपूर्ण प्रकरण हमारे समय में घर-घर की कहानी नहीं भी हैं तो गांव-गांव की कहानी तो जरूर हैं। एक पौराणिक कथा के माध्यम से स्त्री-पुरूष सम्बन्घ की जटिलता को सामने लाना पद को एक सारगर्भित प्रासांगिकता देता है। रचना में एक तो प्रेम कहानी का वर्णन दूसरा इन प्रेम कहानियों पर हमारा समाज किस तरह प्रतिक्रिया करता है उसे प्रमुख कथा-वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना इस पद की जनता में अपील को बढ़ा देता है। इस अपील के बढ़ने में गायक द्वारा कथा की महीन बुनावट का बहुत योगदान है। प्रेम प्रसंग के एक कदम चलने से पहले ही मामला पंच-फैसले के अधीन चला जाता है। पंचायत की उठा-पटक पर जाने से पहले यह जान लेना दिलचस्प होगा कि सिलसिला शुरू कैसे हुआ ? सिलसिला ऐसे शुरू हुआ कि तारा और चन्द्रमा के बीच कुछ-कुछ चल तो रहा ही था एक रोज चन्द्रमा विद्यार्जन के लिए गुरू के पास नहीं पहुंचता है। गुरू ने दो शिष्य भिजवाए-

घर पै पहुंच गए दो चेला
जातैई दियौ चांद कू हेला

अब चंदा बोल्यो नाय देख जा बैठ्यो छा जा पै 
गुरू बिसपत की तारा नार खड़ी पायी दरवाजा पै

अब आप बिम्ब देखिए कितना सुंदर है। चन्द्रमा घर के छज्जे पर चुपचाप बैठा दिखाई दिया। जैसा कि हम उसे जीवन में देखते हैं। घर के दरवाजे पर खड़ी दिखती है प्रेम कथा की नायिका तारा। तारा जब उन शिष्यों को इंकार में जवाब देती है तो चन्द्रमा की चुप्पी अर्थवान हो उठती है। कहने की जरूरत नहीं कि उस चुप्पी का निहितार्थ यह है कि चन्द्रमा न कहते हुए भी यह कह रहा कि ‘भाईयों मैं और तारा साथ रह रहे हैं तो यह मेरी अकेले की मर्जी नहीं है।’ तारा के दो टूक जवाब से बात और भी साफ हो जाती है-

मोकू गुरू गुड़ फीको लग्यौ स्वाद चेला काइ लपटा में 
मैं दुख-सुख लऊँगी काट बैठ चंदा का छज्जा पै

तारा का प्रेम कितना सरल और कितना सच्चा है कि वह वहाँ रहकर दुख-सुख काटने की बात करती है जहां बैठना चन्द्रमा को प्रिय है। छज्जे पर। यूँ वह यह कह ही देती है कि मुझे गुरू गुड़ फीका लगा है और चन्द्रमा का पानी का लपटा ही स्वादिष्ट लगा है। एक भागी हुई स्त्री की मूलभूत भावना का ऐसा नग्न चित्रण लोकगीत में ही संभव है। लोकगीतों की यही वह विशिष्टता है जो साहित्य की तमाम आधुनिक, उत्तर आधुनिक उपलब्धियों के बीच उनके स्थान को अक्षुण्ण बनाए रखती है।

जब शिष्य गुरू को जाकर सारी बात बताते हैं तो गुरू सबसे पहला काम जो करतें हैं वह है-चन्द्रमा को ‘रेस्टीकेट’ करने का काम। युवा छात्रों की विद्रोह-भावना को दबाने की शिक्षक की सबसे निरीह कार्यवाही-

कियो चेला नै खोटो काम 
मंगा रजिस्टर लियो काट दियो चन्दरमा को नाम।
अरे वा दुष्ट नै तनिक न कियो विवेक
और वाइ हांडी में खा गयो स कोई वाइ में कर गयो ठेक।

जिस थाली में खाना उसी में छेद करना-यह एक लोकोक्ति है। यह लोकोक्ति विद्रोह को दबाने के लिए रूढ़िग्रस्त समाज से सहयोग के लिए भावानात्मक अपील का काम करती है। और व्यापक समर्थन पाकर रहती है। गुरू वृहस्पति समाज का समर्थन प्राप्त करने के लिए तर्क देते हैं-

आज तो घरवाड़ी गई म्हारी, तड़कै जायंगी नार तुम्हारी
इस्यां तो जणा-जणा की जायंगी, घर-घर में नार उकतायंगी 
मुसकिल बोदा आसामी की, करौ पाबंदी बैरबाणी की
तड़कै मुल्जिम कू बुलवाल्यौ और पंचन पै न्याय करा ल्यौ
और जुवाड़वाद्यौ पंचात कराद्यौ चन्दरमा पै दण्ड
और करो जात सूं बाहर करौ वाकौ हुक्का पाणी बंद। 

वृहस्पति कह रहे हैं- ‘आज तो मेरी स्त्री गई है, कल को आपकी भी जा सकती हैं। और ऐसे छोटी-मोटी बातों से परेशान होकर हर किसी की स्त्री जाने लगी तो क्या होगा इस समाज-व्यवस्था का। इसलिए सबसे जरूरी है स्त्री के ऐसे दुस्साहस पर फौरन प्रतिबंध लगाना और इस अपराध में शरीक चन्द्रमा को जाति से बहिष्कृत करना। उससे किसी तरह का कोई सम्बन्घ नहीं रखना।’ निहितार्थ ये कि अकेले आदमी को टूट कर झुकने में देर ही कितनी लगती है।

तय होता है अमुक दिन पंचायत होगी और उसी में मामले का निपटारा होगा। वृहस्पति अपने जातिभाईयों से सलाह मशवरा करते हैं। उधर जाति के नाम पर चन्द्रमा के समर्थन में भी आधे पंच आ जाते हैं। राजनीतिक खेल शुरू हो जाता है। राजनीति के अखाड़े में पहुंचकर व्यक्तिगत भावनाएं, संवेदनाएं सदा कुचली ही जाती हैं। कोई भी मामला वहाँ वर्चस्व प्राप्ति के मोहरे से अधिक कुछ नहीं है। चन्द्रमा समर्थकों का मुख्य तर्क यह है कि एक बार आई हुई स्त्री ऐसे कैसे वापस हो जाएगी। हम देखते हैं कल पंचायत होती कैसे है। भैंस तो लाठी वाले के पास ही रहेगी। उधर वृहस्पति समर्थक यह कहते हुए बांहें चढ़ा रहे हैं कि हमारी स्त्री गई है, कोई हंसी खेल नहीं है। जब तक हाड़ के ऐवज में हाड़ यानी स्त्री के बदले स्त्री नहीं ले लेंगे तब तक चन्द्रमा को सुख से नहीं जीने देंगे। आज भी यह एक कटु यथार्थ है कि बदला लेने का सीधा सरल जरिया स्त्री है। उसकी इज्जत से खेल कर बदले की आग बुझायी जाती है। हमारे आसपास ऐसा है, इस अर्थ में आज भी हम बर्बर सामाजिक जीवन जीते हुए उम्र के दिनों को व्यतीत करते हैं। दोनों धड़ो के बीच एक स्त्री, स्त्री नहीं हुई, खिलौना हो गई। चन्द्रमा के अलावा हर कोई स्त्री को जीत कर वर्चस्व की राजनीति का धूर्त खेल खेलना चाहता है।

पंचायत जुड़ती है। चन्द्रमा और तारा तलब किए जाते हैं। तारा को बताना है कि वह किसके साथ रहना चाहती है। तो वह बताती है-

वा नारी नै घूंघट काडी, और पंचन में होगी ठाडी।
गुरू के घर में पग नहीं दूंगी, और मैं तो चन्दरमा कै ही रहूंगी।
और हाथ जोड़ के कहूं पंच थारै जचै जिस्यांई कीज्यौ 
पण मेरी बेई नाम गुरू बिसपत को मत लीज्यौ।

घूंघट निकाल कर तारा पंचों के बीच खड़ी होती है और कहती कि गुरू के घर में पैर भी नहीं रखूंगी और मैं तो चन्द्रमा के साथ ही रहूंगी। तारा पंचों से हाथ जोड़ कर प्रार्थना करती है कि आप चाहे जो भी फैसला करें लेकिन मेरे सामने गुरू वृहस्पति का नाम भी न लें।

इसके बाद कहने और सुनने के लिए क्या बाकी रह जाता है। लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज को सुनता कौन है! पंच फैसला सुनाते हैं कि चन्द्रमा तुम गुरू की पत्नी को वापस करो। उधर चन्द्रमा समर्थक कहते हैं ये फैसला एकतरफा है। पंचायत बिगड़ जाती है। हुल्लड़ मच जाता है। भगदड़ में कोर्ह कहां गिरता है कोई कहां। किसी की पगड़ी उछलती है तो किसी की धोती फटती है। धवले कहते हैं कि-

‘पंचात डटी नहीं डाटी। रहगी धरी दाड़ और बाटी।’ 

रोकने से भी कोई पंचायत में नहीं रुका। बेचारे गुरू वृहस्पति की घबराहट बढ़ गई परंतु उनके धड़े के लोग वर्चस्वशाली थे। कहने लगे ऐसे कहां तक डरेंगे। शास्तर से बात नहीं बनती दिखी तो इस बार वे शस्त्र के साथ आए और तारा को वृहस्पति के हवाले करवाया।

ये जिन्दगी बड़ी जानलेवा चीज है मित्रो। तारा ने गुरू के घर आकर चन्द्रमा को गाली देना शुरू कर दिया- ‘मुझे उस दुष्ट, उस हरामी चन्द्रमा से कोई प्रेम व्रेम नहीं था। वो तो तुम्हारे नाम से मुझे बहका कर ले गया और ले जाकर अपने घर में बैठा लिया।’ अब इसे क्या कहें ? तारा तब सच कह रही थी कि अब ? इसकी जांच किस नारको टेस्ट से की जाए ? उधर वृहस्पति ने अपने दिल को कौनसी विद्या से यह समझाया कि ताकत के बल पर लौटा कर लाई गई तारा अब उसकी हो गई ? ऐसा धुर विरोधाभासी जीवन कैसे जिया जा सकता है? मगर हमारे समाज की विवाह नामक संस्था से ऐसे विरोधाभासी जीवन को उपहार में पाकर हर शादीशुदा जोड़ा ऐसा ही विरोधाभासी जीवन जीने को अभिशप्त है। और यह तो कुछ भी नहीं ग्रामीण सामंती समाज में तो यहाँ तक है कि स्त्री के पति का निधन हो गया तो छोटे भाई का पछेवड़ा/चादर उसे ओढ़ायी जाती है। बच्चे-बच्ची गर्भ में होते हैं यह पता नहीं होता बच्चा होगा या बच्ची और रिश्ता पक्का कर दिया जाता है। गर्भ में ही तय हो गए रिश्तों में ऐसा होना आम बात है कि संयोग से यदि एक गर्भ से लड़का और एक से लड़की पैदा हो भी गए और उनका विवाह माता-पिता ने गोद में लेकर फेरे डलवाकर करवा भी दिया तो भी भारत जैसे देश में जहां कुपोषण बड़ी समस्या है। बच्चे मर भी जाते हैं। ऐसे में वह विवाहित बालिका अपने पति की मां की कोख से अगले पुत्र के आने की प्रतीक्षा करती है। कितने मजे की बात है बाल्यवस्था से ही पति की सेवा का सुख भोगती है! जिन्दगी की जिल्लतें प्रेम जैसी सौंदर्यपूर्ण भावना को भी टंटा बना देती है। वृहस्पति, तारा और चन्द्रमा का टंटा यहीं नहीं सुलटता। तारा की कोख से पुत्र का जन्म होते ही चन्द्रमा अपना पुत्र मांगने गुरू के पास आ जाता है। इस तरह गुरू वृहस्पति एक बार फिर मुश्किल में फंस जाते हैं। वृहस्पति कहते हैं- ‘ऐ बेटी के बाप चांद तू मुझे क्यों परेशान करने पर तुला है। तू जन्म का कंवारा बैठा है। तेरी शादी ही नहीं हुई तो पुत्र कहां से आ जाएगा ?’

तू जनम कंवारो धर्‌यौ बता तेरै छौरा खां सूं आवै
अरे ऐऽऽऽऽ बेटी का बाप चांद तू मोकू क्यों उकतावै।

फिर पंचायत। फिर वाद-विवाद। फिर स्त्री के बयान। स्त्री की आंतरिक शक्ति से ही संभव हुई इस स्वीकारोक्ति का विश्लेषण भी किए जाने लायक एक काम है कि वह कहती है- ‘मेरी कोख से जन्मे इस शिशु का पिता चन्द्रमा है।’
शिशु का नाम बुध रखा गया था। कहते हैं-

चंदा कू दियौ बुध, गुरू कूं दई तारा राणी 
कियो दूध को दूध पंच नै पाणी को पाणी।

धवले के अनुसार तो पंचों ने नीर-क्षीर फैसला किया। आपके अनुसार?
लोकगायक धवले ने पौराणिक कथा को पद में इस तरह से पुनर्सृजित किया है कि वह सदियों पुराने जीवन की कथा या कोरी काल्पनिक कथा न लगकर हमारे आज के जीवन की कथा लगती है। और हमारे मानसिक जगत की संरचना के साथ इस तरह की छेड़छाड़ करती है कि हम स्त्री-पुरूष सम्बन्ध की इस जटिल बहस पर पुनर्विचार करने को विवश होते हैं। लोक साहित्य लोक में इसी तरह विमर्शों के लिए जमीन तैयार करने का काम करता है।

आज भी हमारे ग्रामीण जीवन का यथार्थ सामंतवाद ही है। सारी चीजें ताकत और सामंती दृष्टि से ही तय होती है। और एक लोकगीत उस यथार्थ को हमारे सामने खोलकर रख देता है तो यही उसकी सार्थकता है। कुछ अधपढ़े अफसर और आवारा पूंजी किस्म के लोग जिन्होंने सत्ता बल से समाज में रसूख पाया हुआ है समाज को ऐसी दिशा देने में लगे हैं कि समाज में लोकगीतों का प्रचलन पिछड़ेपन की निशानी है। यह सही नजरिया नहीं है। असल में लोकगीत हमारी सांस्कृतिक विरासत का अंग है। हमें इस धरोहर को संचित करके संग्रहालय की वस्तु नहीं बनाना है बल्कि जीवन का हिस्सा बनाना है। ताकि हमारे दौर में बची-कुछी मानवीय चीजों पर हो रहे चौतरफा हमले से इन्हें बचाया जा सके।

Sunday, March 9, 2014

परोपकार


बहुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे . उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।
वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी ,
” आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं। “
आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।
ऋषिवर बोले , “ प्रिय शिष्यों , आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है . मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें .
यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा .”
तो क्या आप सब तैयार हैं ?”
” हाँ , हम तैयार हैं ”, शिष्य एक स्वर में बोले .
दौड़ शुरू हुई .
सभी तेजी से भागने लगे . वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे . वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह – जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था .
सभी असमंजस में पड़ गए , जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीँ अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे ; खैर , सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।
“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों ?”, ऋषिवर ने प्रश्न किया।
यह सुनकर एक शिष्य बोला , “ गुरु जी , हम सभी लगभग साथ –साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी …कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था …और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा -उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े…. इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की .”
“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ “, ऋषिवर ने आदेश दिया .
आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे . पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे . सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे .
“ मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों के देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं .” ऋषिवर बोले।
“ दरअसल इन्हे मैंने ही उस सुरंग में डाला था , और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।
पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम -भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है . पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम -भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है .


Friday, February 28, 2014

ताला-कुंजी


आदिवासी हाट-बाजार की परंपरा आदिवासियों ने नहीं शुरू की. इसे शुरु किया गैर-आदिवासी समाज ने. जहां उनका ध्येय सिर्फ बेचना और खरीदना होता था. आदिवासियों ने अपनी प्रकृति के अनुसार उसे नाचने-गाने, मिलने-जुलने, सूचना लेने-देने की जगह बना ली. खरीदने-बेचने की प्रक्रिया में शामिल तो धीरे-धीरे हो ही गए. 

खैर, किसी एक हाट-बाजार में एक आदिवासी एक बेचने वाले की वस्तु देखने लगा. वह वस्तु लोहे की थी और बेचने वाला उसे ताला-कुंजी कह रहा था. बहुत देर तक ताला-कुंजी को उलटने-पुलटने के बाद आदिवासी को समझ नहीं आया कि यह वस्तु है क्या और इसका उपयोग क्या है. तब दूकानदार ने समझाया, ‘कीमती वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए इसका इस्तेमाल होता है.’ आदिवासी ने पूछा, ‘कैसे?’ दूकानदार ने बताया, ‘देखो, जब तुम घर में कोई कीमती चीज रखते हो तो उसे यह ताला लगा कर उसे सुरक्षित रख सकते हो. या फिर घर से सपरिवार जाते समय दरवाजे पर इसे लगा कर चोरों से बच सकते हो. ताला-कुंजी तुम्हारी कीमती चीजों की रक्षा करेगा.’ 
आदिवासी ने सहज सवाल किया, ‘कीमती चीजों को सुरक्षित रखने वाली यह चीज तो तब और कीमती हुई?’
दूकानदार बोला, ‘हां.’
आदिवासी मुस्कराया, ‘तो इतनी कीमती चीज को घर के बाहर टांग कर कोई क्यों मुसीबत लेगा? सबके जाने के बाद इसकी रखवाली कौन करेगा?’
दूकानदार अवाक् रह गया. आदिवासी चलता बना.



आदिवासी जगत




"तुम हमारा जिक्र इतिहासों में नहीं पाओगे क्योंकि, हमने अपने को इतिहास के विरूद्ध दे दिया है"
ये पंक्तिया उन्होने किसी भी संदर्भ में लिखी हों, आदिवासी परिप्रेक्ष्य में अर्थस्पष्ट है, फिर भी अपने-अपने हिसाब से इन पंक्तियों को समझा जा सकता है। निष्कर्ष यही निकलेगा कि जिस इतिहास (व्यापक अर्थ में) के विरोध में आदिवासी युग-युगों से लड़ते रहे, उसमें उन्हें जगह कैसे मिलेगी। पौराणिक मिथकों का कुछ अंष रामायण में और अधिकांष महाभारत के माध्यम से पहले ही प्रस्तुत हो चुका था। रामायण के प्रमुख पात्र राम हैं, जिन्हे पुरूषोत्तम के रूप में अब तक संपूर्ण समाज पर स्थापित किया जाता रहा। अगर राम के जीवन में से वनवास के चैदह वर्ष निकाल दिए जायें तो उनके व्यक्तित्व में क्या बचेगा ? उन महत्वपूर्ण चैदह वर्षो में राम आदिवासियों के साथ रहे और उन्ही की ताकत से अनार्याें (आदिवासियों के विषेष संदर्भ में) से युद्वोपरांत विजयी होते हैं। इस सबके बावजूद राम की व्यवस्था में आदिवासी नायकों की भागीदारी, हस्तक्षेप एवं दर्जा क्या रहा ? भद्रजन के लिए यह बड़ा ही असुविधाजनक प्रष्न होगा। निर्दोष शंबूक के वध के बावजूद राम महान रहेंगे ! कितना रोचक होगा अगर हम ’’गुजरात के गोधराकाण्ड-न्यूटन का सिद्वांत-प्रायोजित नरसंहार’’ के समीकरण की ही तरह ’’सूर्पणखा-सीता अपहरण-लंका काण्ड पर न्यूटन के सिद्वांत को लागू करके देखें। राम-रावण युद्ध में दोनों ही तरफ से मरने वाले आदिवासी-अनार्य और युद्व किसके लिए ? इससे भी आगे-आपके लिए जो मानव समुदाय शत्रुपक्ष था उसे मनुष्य न मानकर राक्षस, असुर, दैत्य दानव न जाने किस- किस तरह विरूपित किया गया और जिन्होनें आपका साथ दिया उन्हें गिद्ध, रीछ वानर आदि की संज्ञा देकर जंगली जानवरों की श्रेणी में रख दिया, ताकि भविष्य तक में कभी उनकी असली पहचान न हो सके ??
महाभारत में चिरपरिचित एकलव्य का प्रसंग आता है। आर्यगुरू ने धनुर्विधा सिखाने से मना कर दिया। निषादराजपूत्र से फिर भी उसको गुरू मनवा दिया और अपने बलबूते पर धनुर्धर बन जाने पर भी बतौर दक्षिणा अंगुठा काट कर दिलवा दिया। कान पक गये यह कथा सुनते-सुनते मेरे गले यह कथा इस रूप में कतई नहीं उतरती। तर्क सम्मत यह लगता है कि एकलव्य का अगुंठा जबरन काटा होगा। इस जघन्य अपराध को ढकने के लिए तथा कथित दक्षिणा का स्वांग रचकर थोप दिया गया। आदिवासी स्त्री हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच का प्रसंग आता है। अर्जुन को बचाने के लिए शहीद कर दिया जाता है।
घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक का महत्वपूर्ण प्रसंग महाभारत में है। वह किषोरावस्था में ही था, मगर अत्यन्त बलवान। दुर्योधन कहीं से ढूंढ कर उसे अपने पक्ष में लड़ने के लिए बुला लेता है। वहीं कौरवों की तरफ से लड़ता है। ध्यान देने की बात है कि महाभारत युद्व में अधिकांष आदिवासी कौरवों के पक्ष में लड़े थे। एकलव्य स्वयं इसका उदाहरण है। उसका अगुंठा अगर द्रोणाचार्य मांगता तो शायद वह उसकी सेना के पक्ष में न लड़ता। अगूंठा काटने वाले पांडव थे, इसलिए वह पांडवों के विरूद्व लड़ा था। हो, तो बर्बरीक की कथा यूं चलती है कि जैसे ही वह युद्धभूमि में आया तो, कृष्ण समझ गये कि अब पांडवों का बचना मुष्किल है। क्या किया जावें ? भोले किषोर बर्बरीक को सोलह कला प्रवीण भगवान छलने के लिए चल देते हैं। कहते है-’’कलियुग में तेरी पूजा का इंतजाम किये देता हूँ। इस वक्त बैंकंुठ (या स्वर्ग) धाम में भेजने की गारन्टी भी लेता हूँ। बस एक काम कर दे, लडे मत और तेरी शीष मुझे सौंप दे।’’ ’’जवाब मिलता है, ’’आप तो भगवान है, जो करेगे ठीक ही होगा। मेरी इतनी सी इच्छा है कि दोनो ओर से बडे-बडे धुरंधर लड़ रहे है। मैं इनकी बहादुरी देखना चाहता हँू।’’ शर्त मान ली जाती है। बर्बरीक शीष सौंप देता है। एक मत के अनुसार कुरूक्षेत्र के मैदान के निकट लम्बे बांस पर बर्बरीक का शीष टांँक दिया जाता है, जहंँा से उसने सारा युद्व देखा। दूसरे मत के अनुसार कुरूक्षेत्र के निकट सबसे उँची पहाड़ी चोटी पर शीष रख दिया जाता है। यह पहाड़ सीकर (राजस्थान) के निकट हर्ष पर्वत है जिसकी ऊँचाई 3300 फीट है। माउन्ट आबू के गुरू षिखर (करीब 6000 फीट) के बाद राजस्थान-हरियाणा-निकटवर्ती-उत्तरप्रदेष-पंजाब के अंचल में यही सब से ऊँचा पहाड़ हैं। हर्षपर्वत और रींगस के बीच खाटू श्याम जी का धर्मस्थल है, जिसमें केवल शीष वाली प्रतिमा है, जिसकी पूजा होती है। इसे ’’ष्याम बाबा’’ कहते है। शीष मूर्ति से लगता है यह बर्बरीक ही होगा। हर्ष के पर्वत सीकर से ही उसने महाभारत युद्व देखा। इस प्रसंग को यहीं रोकते है और यह कहते है कि खाटू श्याम जी की मूर्ति तो बर्बरीक की है लेकिन मान्यता यह चली आ रही है कि यह श्री कृष्ण का बाल रूप है और उसी की पूजा होती है। सालाना लक्खी मेला यहंा लगता है। विड़म्बना यह है कि शीष काटकर देने के बाद भी आदिवासी बर्बरीक की जगह कृष्ण को पूजा गया।
एक और प्रसंग महाभारत में। अष्वमेघी यज्ञ के घोडे की यात्रा के दौरान अर्जुन की लड़ाई बभू्र वाहन से होती है। यह स्थान पूर्वांचल है। बभ्रूवाहनं मणीपुर के आदिवासी राजा चित्रवाहन की राजकुमारी चित्रांगदा का पुत्र था। उल्लेखनीय है अर्जुन ने चित्रांगधा और नाग कन्या उलूपी (दोनों आदिवासी) से विवाह (?) किया था। लड़ाई में अर्जुन मारा जाता हंै (बेहोष हुआ होगा) और उलूपी जड़ी-बूटियों से उसे जीवित (?) करती है। प्रष्न यह है कि अर्जुन धूल चटा देने वाला शुरवीर बभ्रूवाहन महान नहीं माना जाकर अतुलनीय योद्वा अर्जुन को ही बताया जाता है। एक और प्रसंग। कृष्ण का वध जारा शबर नामक आदिवासी के हाथों होता है। मैंने वध स्थल (गुजरात) की यात्रा की है। घटना स्थल की परख की । किसी भी कोंण से देखैं, यह सम्भव ही नहीं कि हरिण की आंँख समझ कर पगतल में चमकते पदम चिन्ह पर निषाना साधा हो। अगर आखेट था तो शबर का बाण जहरीला नहीं हो सकता और बाण जहरीला नहीं था, तो पैर में बाण लगने से कम से कम तत्काल तो मृत्यु नहीं हो सकती। इसके लिए पूरे शरीर का ’’सेप्टिक’’ होना जरूरी होगा। वह भी तब, जब कि कोई उपचार न किया जाये। आप कहते रहिए अगल जन्म में बाली के हाथों मरने वाला वरदान राम ने दिया था। और जारा शबर ही त्रेतायुग का बाली था। सारे सन्दर्भ देखने पडंेगे। खाण्डव वन दहन में आदिवासी नाग जाति को भस्म करने में कृष्ण एवं अर्जुन द्वारा अग्नि का सहयोग करने से लेकर कंस-षिषुपाल-जयद्रथ वध, एकलव्य का ’’अगुंठा’’, घटोत्कच-बर्बरीक-बभ्रूवाहन प्रसंग तक। यही नहीं, जाना होगा सतयुग और त्रेतायुग में भी। आप भीलों की मौखिक और गेय परम्परा का महाभारत (’’भीलों का भारथ’’ द्वारा श्री भगवानदास पटेल) पढ जाइये। पात्र एवं घटनास्थल करीब-करीब वही है लेकिन संदर्भ बदले हुए पायेंगे। वहंा अर्जुन की जगह नागवंषी आदिवासी राजा वासुकी अतुलनीय यौद्वा और बलवान मिलेगा।
श्री पटेल भीलों की रामायण भी लिख रहे हैं। उनका यह अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है आदिवासियों की दृष्टि से भारतीय मिथकों की व्याख्या के परिप्रेक्ष्य में। पूरा का पूरा तथा कथित सतयुग भरा पड़ा है मिथकों से और मिथकों में आदिवासियों के विकृतिकरण से। इंद्र का सन्दर्भ ले लिजिए। छल-छद्म, अययास, व्यभिचार, यहाँ तक की बलात्कार (कानूनी परिभाषा और अहल्या प्रसंग) क्या-क्या कुकर्म उसने नहीं किए, और मनुष्य में श्रेष्ठ देवता और देवताओं के स्वामी (श्रेष्ठम) इन्द्र की पूजा आप करते रहिए। नारद, तुम्बरू जैसे पात्र अनार्य-आदिवासी थे। नारद के चरित्र को समझिए इन्द्र की व्यवस्था के विरोध में हर जगह व्यंग करता है। उसके कथनों की मूल भावना और उद्देष्यों को समझने के लिए दिमाग पर अधिक जोर देने की आवष्यकता ही नहीं पड़ेगी।
 क्या हैं ये ’’महान’’ चंद्रवंषी और सूर्यवंषी श्रत्रिय ? उन्हीं के समर्थन में लिये गये षास्त्रों से स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। पुरूरवा की अप्सरा (वेष्या) पत्नी उर्वषी की औलाद की पीढ़ियां चंद्रवंषी और अप्सरा (वेष्या) मेनका पुत्री ष्षंकुतला की औलाद की पीढ़िया सूर्यवंषी हुए। यह पूछना बड़ा ही असुविधाजनक होगा कि ‘‘तुम्हारी (दोनों वंषों की) आद्यजननी तो थीं, फिर तुम महान कुल परंपरा कैसे हुए ?’’ दूसरी तरफ यह सवाल उठता है कि प्राचीन काल में अपनी पुष्तैनी धरती पर ष्षांति से जीवन जी रहे आदिम समुदायों पर आपने बाहर से आकर हमले किए, उन्हें मारा, दास बनाया, भगाया और फिर असुर, राक्षस, जंगली जानवरों की संज्ञा दी। फिर तुम श्रेष्ठ कैसे हुए ?
आदिवासी इतिहास लिखने से पहले हमें ‘‘मिथकों में आदिवासी’’ के सारे संदर्भो को पुनव्र्याख्याथित करना होगा। आस्था और भावना अपनी जगह है मगर अतीत का निरूपण तो तथ्यात्मक, तार्किक, बौद्धिक व वैज्ञानिक ही होगा। अब बात आती है इतिहास में आदिवासियों की। इससे पहले यह देखा जाये कि इतिहास मंे आम आदमी किस हद तक होता है ? इतिहास के नाम पर हजारों वर्षों तक राजा - महाराजाओं का इतिहास ही लिखा जाता रहा। प्राचीन काल से मुगल काल तक भाट - चारणी - दरबारी इतिहासकारों की परंपरा हावी रही। इसमें प्राचीन सम्राटों , तथाकथित गणराज्यों के शासकों , मुस्लिम बादषाहों , रियासती सामंतों के पक्ष में इतिहास लिखा व लिखवाया जाता रहा। 



 आदिवासी जगत
(पुस्तक के आभार से.)



Tuesday, February 25, 2014

आदिवासी जगत



आदिवासी जाति नही जमात है, मुख्यधारा में लाने की बात सही नहीं क्योंकि मुख्यधारा में भी दोष है। क्या मुख्यधारा में आने पर उनकी संस्कृति और मूल्य बचे रह सकेंगे? आज उनकी धार्मिक, संस्कृति पर आक्रमण हो रहे हैं।
नेहरू ने कहा है ‘‘आदिवासियों में मुझे कई ऐसे गुण दिखाई दिये जो भारत के मैदानी इलाकों, शहरों और अन्य भागों में रहने वालों में नहीं हैं। इन्हीं गुणों के कारण मैं आकृष्ट हुआ। आदिवासियों के प्रति हमारा रवैया आदानशील होना चाहिए। इन लोगों में बहुत अनुशासन है और वे भारत में अधिकांश लोगों की तुलना में कहीं अधिक लोकतांत्रिक हैं।‘‘ आदिवासी जन में ऐसे मूल्य कहां से विकसित हुुए ? इस प्रश्न का उत्तर फ्रेेडरिक एंगेल्स ने बहुत पहले यह कह कर दिया था कि ‘‘आदिवासी समाज का वैभव और बंधन इसी बात में था कि उसमें कोई शासक और शासित नहीं था।‘‘ डाॅ0 डी0 पी0 चट्टोपाध्याय ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘लोकायत‘ में स्पष्ट किया है कि ‘‘....गण, प्रांत, संघ, पुग, श्रेणी ये सभी शब्द एक दूसरे के पर्याय थे। मानव समाज व्यवस्था के संदर्भ में इनसे जिस सामूहिकता का संकेत मिलता है उसका सीधा सा अर्थ था आदिवासी सामूहिकता।‘‘ समानता एवं सामूहिकता के जिन गुणों पर पं नेहरू, एंगेल्स, एवं चट्टोपाध्याय ने जोर दिया, उसी क्रम में श्रम की महत्ता आदिवासी संस्कृति का एक स्तम्भ रहा है। ‘भद्र समाज के पास ये गुण नहीं थे और अपनी श्रेष्ठता स्थापित करनी थी, इसलिए शारीरिक श्रम की तुलना बुद्धि वैभव से की गई और उसी काल खण्ड (वह आर्य विजेताओं का अनार्य-जन पर सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने का समय था।) में जिस श्रम प्रक्रिया का समायोजन मानव मस्तिष्क ने किया था, उसी को वह दूसरों से करवाना चाहता था और स्वयं उस श्रम से बचना चाहता था।





Tuesday, February 4, 2014

Forener Wife

जब यूनानी आक्रमणकारी सेल्यूकस चन्द्रगुप्त मौर्य से हार गया और उसकी सेना बंदी बना ली गयी तब उसने अपनी खूबसूरत बेटी हेलेना के विवाह का प्रस्ताव चन्द्रगुप्त के पास भेजा | सेल्यूकस की सबसे छोटी बेटी हेलेन बेहद खुबसूरत थी , उसका विवाह आचार्य चाणक्य ने प्रस्ताव मिलने पर सम्राट चन्द्रगुप्त से कराया|  पर उन्होंने विवाह से पहले हेलेन और चन्द्रगुप्त से कुछ शर्ते रखी ; जिस बाद ही उन दोनों का विवाह हुआ |
पहली शर्त यह थी की उन दोनों से उत्पन्न संतान उनके राज्य का उत्तराधिकारी नहीं होगा | और इसका कारण बताया की हेलेन एक विदेशी महिला है , और भारत के पूर्वजों से उसका कोई नाता नहीं है , भारतीय संस्कृति से हेलेन पूर्णतः अनभिग्य है और दूसरा कारण बताया की हेलेन विदेशी शत्रुओं की बेटी है | उसकी निष्ठा कभी भारत के साथ नहीं हो सकती | तीसरा कारण बताया की हेलेन का बेटा विदेशी माँ का पुत्र होने के नाते उसके प्रभाव से कभी मुक्त नहीं हो पायेगा और भारतीय माटी, भारतीय लोगो के प्रति पूर्ण निष्ठावान नहीं हो पायेगा | एक और शर्त चाणक्य ने हेलेन के सामने रखी की वह कभी भी चन्द्रगुप्त के राज्य कार्य में हस्तक्शेप नहीं करेगी और राजनीति और प्रशासनिक अधिकार से पूर्णतया विरत रहेगी ; परंतु गृहस्थ जीवन में हेलेन का पूर्ण अधिकार होगा |
सोचिये मित्रो  | भारत ही नही विश्व भर में चाणक्य जैसा कुटनीतिक और नीतिकार राजनितिक आज तक दूसरा कोई नही पैदा हुआ |
फिर भी आज भारत उनकी सबक को भूल गया और देश पर शासन कौन कर रहा है? सब आपके सामने है |