Tuesday, February 25, 2014

आदिवासी जगत



आदिवासी जाति नही जमात है, मुख्यधारा में लाने की बात सही नहीं क्योंकि मुख्यधारा में भी दोष है। क्या मुख्यधारा में आने पर उनकी संस्कृति और मूल्य बचे रह सकेंगे? आज उनकी धार्मिक, संस्कृति पर आक्रमण हो रहे हैं।
नेहरू ने कहा है ‘‘आदिवासियों में मुझे कई ऐसे गुण दिखाई दिये जो भारत के मैदानी इलाकों, शहरों और अन्य भागों में रहने वालों में नहीं हैं। इन्हीं गुणों के कारण मैं आकृष्ट हुआ। आदिवासियों के प्रति हमारा रवैया आदानशील होना चाहिए। इन लोगों में बहुत अनुशासन है और वे भारत में अधिकांश लोगों की तुलना में कहीं अधिक लोकतांत्रिक हैं।‘‘ आदिवासी जन में ऐसे मूल्य कहां से विकसित हुुए ? इस प्रश्न का उत्तर फ्रेेडरिक एंगेल्स ने बहुत पहले यह कह कर दिया था कि ‘‘आदिवासी समाज का वैभव और बंधन इसी बात में था कि उसमें कोई शासक और शासित नहीं था।‘‘ डाॅ0 डी0 पी0 चट्टोपाध्याय ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘लोकायत‘ में स्पष्ट किया है कि ‘‘....गण, प्रांत, संघ, पुग, श्रेणी ये सभी शब्द एक दूसरे के पर्याय थे। मानव समाज व्यवस्था के संदर्भ में इनसे जिस सामूहिकता का संकेत मिलता है उसका सीधा सा अर्थ था आदिवासी सामूहिकता।‘‘ समानता एवं सामूहिकता के जिन गुणों पर पं नेहरू, एंगेल्स, एवं चट्टोपाध्याय ने जोर दिया, उसी क्रम में श्रम की महत्ता आदिवासी संस्कृति का एक स्तम्भ रहा है। ‘भद्र समाज के पास ये गुण नहीं थे और अपनी श्रेष्ठता स्थापित करनी थी, इसलिए शारीरिक श्रम की तुलना बुद्धि वैभव से की गई और उसी काल खण्ड (वह आर्य विजेताओं का अनार्य-जन पर सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने का समय था।) में जिस श्रम प्रक्रिया का समायोजन मानव मस्तिष्क ने किया था, उसी को वह दूसरों से करवाना चाहता था और स्वयं उस श्रम से बचना चाहता था।





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