आदिवासी हाट-बाजार की परंपरा आदिवासियों ने नहीं शुरू की. इसे शुरु किया गैर-आदिवासी समाज ने. जहां उनका ध्येय सिर्फ बेचना और खरीदना होता था. आदिवासियों ने अपनी प्रकृति के अनुसार उसे नाचने-गाने, मिलने-जुलने, सूचना लेने-देने की जगह बना ली. खरीदने-बेचने की प्रक्रिया में शामिल तो धीरे-धीरे हो ही गए.
खैर, किसी एक हाट-बाजार में एक आदिवासी एक बेचने वाले की वस्तु देखने लगा. वह वस्तु लोहे की थी और बेचने वाला उसे ताला-कुंजी कह रहा था. बहुत देर तक ताला-कुंजी को उलटने-पुलटने के बाद आदिवासी को समझ नहीं आया कि यह वस्तु है क्या और इसका उपयोग क्या है. तब दूकानदार ने समझाया, ‘कीमती वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए इसका इस्तेमाल होता है.’ आदिवासी ने पूछा, ‘कैसे?’ दूकानदार ने बताया, ‘देखो, जब तुम घर में कोई कीमती चीज रखते हो तो उसे यह ताला लगा कर उसे सुरक्षित रख सकते हो. या फिर घर से सपरिवार जाते समय दरवाजे पर इसे लगा कर चोरों से बच सकते हो. ताला-कुंजी तुम्हारी कीमती चीजों की रक्षा करेगा.’
आदिवासी ने सहज सवाल किया, ‘कीमती चीजों को सुरक्षित रखने वाली यह चीज तो तब और कीमती हुई?’दूकानदार बोला, ‘हां.’
आदिवासी मुस्कराया, ‘तो इतनी कीमती चीज को घर के बाहर टांग कर कोई क्यों मुसीबत लेगा? सबके जाने के बाद इसकी रखवाली कौन करेगा?’
दूकानदार अवाक् रह गया. आदिवासी चलता बना.

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