मीणा और भील जनजातियों की उत्पत्ति के बारे में अनेक किवदंतियां प्रचलित है। उनमें से अधिकांश तो सर्वथा अविश्वसनीय हैं। इतिहासकार रावत सारस्वत के अनुसार मीणा लोग सिंधु घाटी सभ्यता के प्रोटां द्रविड़ लोग हैं, जिनका गणचिन्ह मछली था। आर्य लोग इन्हें मीन शब्द के पर्याय मत्स्य से संबोधित करते रहे, जबकि ये लोग स्वयं को मीना ही कहते रहे। पर्याप्त समय बीत जाने पर वैदिक साहित्य में इन्हें आर्य मान लिया गया था। ये लोग सीथियन, शक, क्षत्रप, हूण जाति के वंशज न होकर यहां के आदिवासी ही माने जाते हैं, जो भले ही कभी पुरातन काल में बाहर से आकर बसे हों। इतिहासकारों के अनुसार आर्यों तथा अन्य जातियों के खदेड़े जाने पर ही ये सिंधु घाटी से हटकर अरावली पर्वतमाला में आ बसे, जहां इनके गोत्र आज भी हैं। (मीणा इतिहास, पृष्ठ 21) विभिन्न ग्रंथों में मीना शब्द की व्याख्या इस प्रकार से की गयी है। मीनाति मन्युनीति मीन (अभियान चिंतामणिकोष) अर्थात् दुष्टों को मारने वाली जाति को मीना कहते हैं। मी बधे, त्रियाडम शब्दसेट, मीनाति, मीनीते, आसीत आमास्तावतः मीनाः (अभियान चिंतामणि कोष) अर्थात अनार्थ दैत्यों का वध करने वाली क्षत्रिय जाति को मीना कहते हैं। हिन मीना पाणि केन मीनो, इति निपात्यते सिद्धांत कौमुदी अर्थात दुष्टों को मार कर गौ-ब्राह्मण की रक्षा करने वाले वीर क्षत्रिय समाज को मीना कहते हैं।
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