"इस देश का दुर्भाग्य है की इस देश का एजेंडा "मीडिया" तय करता है और हम कभी जान नहीं पाते की मीडिया का एजेंडा कौन तय कर रहा है. पिछले 12 साल में मुझे याद नहीं कि मैंने कभी मोदी के बारे में तारीफ़ किसी भी मीडिया चेनल पे सुनी हो, उनकी रैलियां दिखाना जहां मीडिया के लिए TRP का सौदा है वही हर रैली के बाद उनका १ सेंटेंस तोड़ मरोड़ कर १ हफ्ते तक दिखाया जाता है. इस देश से छिपा नहीं है कि मीडिया किस तरह सत्ता धारी दल की "कैकयी" कि भूमिका निभाता रहा है. ऐसे में जब इनकी और इनके मालिकों कि चूलें मोदी ने हिला दी, तो एक नयी मीडिया प्रायोजित नौटंकी ही मीडिया ने देश के जनमानस पे थोप दी. हम भी भोले हैं, एक बार फिर से फंस गए. यूँ ही नहीं मुगलों ने सेकड़ो, अंग्रेज़ों ने २०० और कांग्रेस ने 60 साल इस देश पर राज किया है. हम भोलेपन में ये भूल जाते हैं कि इस देश में अगर पृथ्वी राज हुआ है तो "जयचंद" भी इसी देश ने दिया है, अगर चंद्रशेखर आज़ाद दिया है तो "अल्फ्रेड पार्क के बगल में कोठी में रहने वाला" भी दिया है. हम कभी इतिहास से सबक नहीं सीखते और फिर हमारी आने वाली नस्ल हमारे कुकर्मो को झेलती फिरती है. आम आदमी अपने आप को कितना भी होशियार समझ ले, लेकिन सच यही है कि वो हज़ारों सालो से, लघभग हर बार ही चु=या बना है. और जिस तरह का प्रपंच मीडिया और कांग्रेस रच रहे हैं और जिस तरह अपनों में से कुछ मीडिया कि नौटंकी में बहते हुए जा रहे हैं. सम्भावना कम ही है कि 2014 भारतीय राजनीति में अपवाद बनेगा. ख़ैर, हम सबको तय करना है कि इस संग्राम में हम
अभिमन्यु बनते हैं या दुशाशन."
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